ऑफिस – ऑफिस …!!

office

ऑफिस –  ऑफिस …!!


ऑफिस – ऑफिस !
कैसा – ऑफिस ??

कैसा – ऑफिस !
आफत – ऑफिस !
हर जगह से खटपट ऑफिस !!

सुबह उठाए हलकट ऑफिस ,
रोज़ नहलाये बिन मन ऑफिस ,
दौड़ लगवाए जोर से ऑफिस !!

ऑफिस – ऑफिस !
कैसा – ऑफिस ??

कैसा – ऑफिस !
घातक – ऑफिस !
हर जगह से झंझट ऑफिस !!

काम कराये जबरन ऑफिस ,
खिल्ली उडाये नटखट ऑफिस ,
डांट लगाए खूंसट ऑफिस !!

ऑफिस – ऑफिस !
कैसा – ऑफिस ??

कैसा – ऑफिस !
बरकत – ऑफिस !
कई जगह से न्यारा ऑफिस !!

खुसर – फुसर में गप्पी ऑफिस ,
इश्क लड़ाए आशिक ऑफिस ,
नोट दिलाये सरपट ऑफिस !!

ऑफिस – ऑफिस …!!
कैसा – ऑफिस ??

.                           - संभव

लप्पड़ … !!!

thappad

लप्पड़ … !!!


जिंदगी  की इस दौड़ में ,
हमने खाए कई लप्पड़ !!
छोटे जो थे , करी शरारत ,
कोई न देखे , हमरी नजाकत ;
माता जी ने खींच लगाए ,
हुमने खाए कई लप्पड़ !!

बाल  अवस्था , हुई पुरानी ,
हर कक्षा में , वही कहानी ,
याद हमें पर कुछ न होता ,
भूंसे में अब कुछ न जाता ,
टीचर जी ! हम पर चिल्लाए ,
हुमने खाए कई लप्पड़ !!

युवा अवस्था , बड़ी सयानी ,
इक कालेज में , बिसरी जवानी ,
एक सुन्दर बाला हमको भायी ,
पहलवान था , पर उसका भाई ,
भाई !! साहब  ने खूब बाजाया ,
हुमने खाए कई लप्पड़ !!

रोज़गार ,  एक बड़ी मुसीबत ,
रोज होती  , वाही कवायद ,
काम-काज  में मन न लगे ,
बहानों से भी जब काम न चले ,
बॉस !!  तब हम पर घुस्साए ,
हुमने खाए कई लप्पड़ !!

क्या सूझी जो , ब्याह रचाया ,
अपने हाथों , गला दबाया ,
बीबी जी ने कुछ चीज़ मंगाई,
बात हमें पर याद न आई ,
श्रीमतीजी !!  हम पर  झल्लायीं ,
हुमने खाए कई लप्पड़ !!

प्रौड़ अवस्था ,  अब है बाकी,
कब्र में अपनी ,  आधी काठी ,
बच्चों को भी हम न भायें ,
खूसट कह कर हमें चिडायें ,
अब तो बस भगवान् बचाए ,
हुमने खाए कई लप्पड़ !!

.                              – संभव


बनारसी ठग …!!!

बनारसी ठग …!!!

ठगों की नगरी , जिला बनारस,
आ पहुंचे हम , एक दिवारस ;
ट्रेन से उतरे , चप्पल गायब,
सोचा ही था , क्या होगा अब ?


पलट के देखा , बैग न पाया ,
अब तो हमरा , दिल घबराया ;
जल्द ही हमने , रपट लिखाई ,
थानेदार को , कुछ भेंट चढाई |


निकले बहार तो , जोर से आई ,
पैखाने तक , दौड़ लगाई ;
पतलून वहीँ पर , हमने गंवाई
कच्छे ने थी , इज्ज़त बचाई |


बटुए का था , बचा सहारा ,
खोल के देखा , खाली सारा !!
बुशर्ट से अपनी , तब ली विदाई ,
उन पैसों की, टिकट बनायी |


ट्रेन में बैठे , शर्म थी आई,
देख रही थीं , सबकी लुगाई ;
बस !! जान बची तो , लाखों पाए ,
लौट के नंगे , घर को आये !!!

.                                             – संभव