बनारसी ठग …!!!

बनारसी ठग …!!!

ठगों की नगरी , जिला बनारस,
आ पहुंचे हम , एक दिवारस ;
ट्रेन से उतरे , चप्पल गायब,
सोचा ही था , क्या होगा अब ?


पलट के देखा , बैग न पाया ,
अब तो हमरा , दिल घबराया ;
जल्द ही हमने , रपट लिखाई ,
थानेदार को , कुछ भेंट चढाई |


निकले बहार तो , जोर से आई ,
पैखाने तक , दौड़ लगाई ;
पतलून वहीँ पर , हमने गंवाई
कच्छे ने थी , इज्ज़त बचाई |


बटुए का था , बचा सहारा ,
खोल के देखा , खाली सारा !!
बुशर्ट से अपनी , तब ली विदाई ,
उन पैसों की, टिकट बनायी |


ट्रेन में बैठे , शर्म थी आई,
देख रही थीं , सबकी लुगाई ;
बस !! जान बची तो , लाखों पाए ,
लौट के नंगे , घर को आये !!!

.                                             – संभव

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गधों की सत्ता …!!!

गधों की सत्ता …!!!

घोडों के सरदार, जब गधे हो गए …
सत्ता के आचार, सब तब ढेर हो गए |
चापलूस घोडों का, नगर में राज हो गया …
आम घोडे की “शान” का, यूँ हास हो गया ||

दौड़ के मैदान, “गध-दौड़” के लिए मशहूर हो गए …
एक से एक आला घोडे, सब मजदूर हो गए |
शतरंज की बिसात पर, गधों की चाल हो गई …
कुश्तियां “दुल्लातियों” में तब्दील हो गयीं ||

“हिन्-हिन्” में भी, “ढेंचू” का प्रयोग हो गया …
रेत में लोटना, अब एक योग हो गया |
गधों में भी अस्तबल का रौब हो गया …
चारे में चने का, एक शौक हो गया ||

घोडों का झुंड एक इतिहास हो गया …
“गधों के समाज” से विख्यात हो गया |
गधों का, घोडों पर उपहास हो गया
घोडों को भी गधों पर, जब नाज़ हो गया ..!!!

.                                           – संभव

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A satire on today’s Politics , hope this will be visible.

Do read :-
(i) George Orwell’s “Animal Farm” if you haven’t yet.
(ii) ओम प्रकाश आदित्य की “इधर भी गधे हैं, उधर भी गधे हैं “

जाते जाते – किसी ने आज के परिपेक्ष में लिखा है
“घोडों को मिलाती नही है घांस यहाँ , गधे खा रहे देखो साग यहाँ”